Ex :-1 यूरोप में राष्ट्रवाद



* राष्ट्रवाद:- राष्ट्रवाद एक भावना है, राष्ट्रवाद अपने राष्ट्र के प्रत्ति प्रेम है l 
  राष्ट्रवाद अपने राष्ट्र के भौगालिक , संस्कृति और समाज में रहने वाले लोगो में प्रेम और एकता की भावना हैl 
*उदारवाद(Liberalism):-उदारवाद वह विचारधारा है जिसके अंतर्गत मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते हुए सामाजिक संस्थाओं के मनुष्यों की सूझबूझ और सामूहिक प्रयास का परिणाम समझा जाता है।
 राष्ट्रवाद की भावना का बीजारोपण यूरोप में पुनजार्गरण के काल से ही हो चूका था,लेकिन 1789o की फ़्रांसिसी क्रांति से यह उन्नत रूप में प्रकट हुई।   
यूरोप में राष्ट्रीयता की  भावना के विकाश में फ़्रांस की राज्यक्रांति , नेपोलियन के आक्रमणों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। 
सन्न 1815ई० के वियना सम्मेलन की मेजबानी ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने किया। 
         इस सम्मलेन में ब्रिटेन ,रूस ,प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियनो ने मिलकर ऐसी व्यवस्था की जिसका मुख्य उद्देश्य यूरोप में शांति संतुलन को स्थापित करना था , जिसे नेपोलियन के युद्धों ने समाप्त कर  दिया था। 
Note:-1815 से 1848 तक के समय को युरोप में मेटरनिख युग के नाम से जाना जाता है। 
वियान सम्मेलन के माध्यम से युरोप में नेपोलियन युग का अंत हुआ और मेटरनिख युग युग की शुरुआत हुई।
फ़्रांस में वियना व्यवस्था के तहत क्रांति के पहले की व्यवस्था को स्थापित करने के लिए वूऱवो राजवंश को पुर्नस्थापित किया गया था l

* जुलाई 1830ई० की क्रांति

 चालर्स x  एक निरकुंश एवं  प्रतिक्रयावादी शासक था जिसने फ्रांस में उभर रही राष्ट्रीयता तथा जनतंत्रवादी भावनाओं  को दवाने का कार्य किया और उसके द्वारा प्रतिक्रियावादी पोलीगनेक को प्रधानमंत्री बनाया गया। 
पोलिगनेक ने समान नागरिक संहिता के स्थान पर शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग की स्थापना किया और इस कदम को उदारवादियों ने चुनौती तथा क्रांति के विरुद्ध षड़यंत्र  समझा। प्रतिनिधि सदन ने पोलिगनेक के  विरुद्ध गहरा असंतोष प्रकट किया l
चालर्स -x  ने इस विरोध के प्रतिक्रियास्वरूप 25 जुलाई 1830 ई ० को चार अध्यादेशों द्वारा उदार तत्वों को गला घोटने का प्रयास किया। 
            इस अध्यादेशों के विरोध में 28 जुलाई 1830 ई ० से गृह युद्ध आरम्भ हो गया l इसे ही जुलाई 1830 की क्रांति कहते हैं। 
जुलाई 1830 ई ० की क्रांति के परिणामस्वरूप फ़्रांस में बूर्वो वंश क अंत हो गया। 

*1848 ई ० की क्रांति

लूई  फिलिप एक उदारवादी शासक था ,परन्तु बहुत अधिक महत्वकांक्षी था l उसने अपने विरोधियों को खुश करने के लिए स्वर्णिम मध्यंवर्गीय निति का अवलम्वन करते हुए 1840 मे गिजो को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जो कट्टर प्रतिक्रियावादी था। 
वह किसी भी तरह के वैधानिक ,सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों के विरुद्ध था। लुई फिलिप ने पूंजीपति वर्ग को अपने साथ रखना पसंद किया ,जिसे शासन के कार्यो में कोई रूचि नहीं थी और जो अल्पमत में भी था। उसके पास किसी भी तरह का सुधारात्मक कार्यक्रम नहीं था। उसके शासनकाल में देश में भुखमरी एवं एवं बेरोजगारी व्याप्त होने लगी ,जिसके कारण 1848 की क्रांति हुई।

*इटली का एकीकरण :-

⇒इटली एकीकरण को इतालवी भाषा में इल रिसोरजिमेंतो कहते हैं. 19वीं सदी में इटली में एक राजनैतिक और सामाजिक अभियान शुरू हुआ जिसने इटली प्रायद्वीप के विभिन्न राज्यों को संगठित करके एक इतालवी राष्ट्र बना दिया. इसे इटली एकीकरण कहा गया. इटली का एकीकरण सन् 1815 में इटली पर नेपोलियन बोनापार्ट के राज के अंत पर होने वाले वियेना सम्मलेन के साथ आरंभ हुआ और 1870 में राजा वित्तोरियो इमानुएले की सेनाओं द्वारा रोम पर कब्‍जा होने तक चला.
 इटली के एकीकरण में सबसे बड़ा बाधक ऑस्ट्रिया था।
 सार्डनिया पीडमौंट राज्‍य ने इटली के एकीकरण में अगुवाई की।
 काउंट काबूर इटली की समस्‍या को अंतर्राष्ट्रीय समस्‍या बना दिया।
 इटली के एकीकरण का श्रेय मेजिनी, काउंट काबूर और गैरीबाल्‍डी को दिया जाता है।
 इटली के एकीकरण का तलवार गैरीबाल्‍डी को कहा जाता है।
 यंग इटली की स्‍थापना 1831 ई. में जोसेफ मेजिनी ने की।
 गैरीबाल्‍डी ने लाल कुरती नाम से सेना का संगठन किया था।
 कार्बोनरी सोसायटी का संस्‍थापक गिवर्टी था।
 इटली के एकीकरण की शुरुआत लोम्‍बर्डी और सार्डिनिया के राज्‍यों के मिलने से हुई।
 इटली देश का जन्‍म 2 अप्रैल 1860 ई. से माना जाता है। 
 रोम को संयुक्‍त इटली की राजधानी 1871 में घोषित कि या गया।
 यदी समाज में क्रांति लानी हो तो क्रांति का नेतृत्‍व नवयुवको के हाथ में दे दो-ये कथन जोसेफ मेजिनी का था।
 इटली का एकीकरण 1871 ई. में काउंट काबूर ने किया।
 इटली की एकता का जन्‍मदाता नेपोलियन था।
 विक्‍टर एमैनुएल सार्डिनिया का शासक था।
 इटली के एकीकरण का जनक जोसेफ मेजिनी को माना जाता है. मेजिनी का जन्‍म जेनेवा में हुआ था।
 19 सदी के पूर्वार्द्ध में इटली में 13 राज्‍य थे।

*मेजिनी

मेजिनी साहित्यकार ,गणतांत्रिक विचारों का समर्थक और योग्य सेनापति था। लेकिन मेजिनी में आदर्शवादी गुण अधिक और व्यावहारिक गुण कम थे। और इटली के एकीकरण में मेजिनी का महत्वपूर्ण योगदान था ,
सन्न 1831ई० में उसने "यंग यूरोप" नामक संस्था का गठन किया।
मेजिनी का संबंध गुप्त दल 'कार्बोनरी' संगठन से था।
इटली में सार्डिनिया-पीडमाउण्ड का नया शासक विक्टर इमैनुएल  ने 'काउंट कावुर'को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।

*काउंट कावुर :-

काउंट कावुर एक सफल कूटनीतिज्ञ एवं राष्ट्रवादी था। वह इटली के एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा ऑस्ट्रिया को मानता था।
     काउंट कावुर पीडमाउण्ट के शासक विक्टर इमेनुएल द्वितीय का प्रमुख मंत्री था। वह न तो क्रन्तिकारी था और न ही डेमोक्रेट। वह एक अच्छा कूटनीतिज्ञ था। वह इतलाबी वर्ग के अशिक्षित और अमीर वर्ग की तरह बेहतर फ्रेंच बोलता था। उसने इटली में विभिन्न क्षेत्रों को एकत्रित करने वाले आंदोलनों का नेतृत्व किया। उसने सार्डिनिया-पीडमाउण्ट की फ्रांस से संधि करवाई,जिससे 1859 में सार्डिनिया-पीडमाउण्ट ,आस्ट्रियाई बालों को हराने में कामयाब हुआ। इटली के एकीकरण की वजह से उसने सार्डनिया-पीडमाउण्ट के साथ लगे दक्षिण-राज्य को फतह करने के लिए गैरीबाल्डी को प्रेरित किया।

*गैरीबाल्डी :-

गैरीबाल्डी पेशे से एक नाविक था और मेजिनी के विचारों का समर्थक था परन्तु बाद में कावूर के प्रभाव में आकर सवैधानिक राजतंत्र का पक्षधर बन गया।  गैरीबाल्डी ने अपनी कर्मचारियों तथा सेवकों की सशस्त्र सेना बनायीं और गौरीबाल्डी सशस्त्र क्रांति के द्वारा दक्षिणी इटली के रियासतों के एकीकरण तथा गणतंत्र की स्थापना करने का प्रयास कर रहा था।उसने अपने सैनिकों को लेकर इटली के प्रांत सिसली तथा नेपल्स पर आक्रमण किये। इन रियासतों की अधिकांश जनता बूर्वो राजवंश के निरकुंश शासन से तंग होकर गैरीबाल्डी की समर्थक बन गयी। गैरीबाल्डी ने यहाँ गणतंत्र की स्थापना की तथा विक्टर इमैनुएल के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ की सत्ता संभाली। दक्षिणी इटली के जीते गए क्षेत्र को बिना किसी संधि के गैरीबाल्डी ने विक्टर इमैनुएल को सौंप दिया। गैरीबाल्डी को दक्षिणी क्षेत्र में शासक बनने का प्रस्ताव विक्टर इमैनुएल द्वारा दिया भी गया परन्तु उसने इसे अस्वीकार कर दिया। और वह अपनी सारी सम्पति राष्ट्र को समर्पित कर साधारण किसान की भाँति जीवन जीने की ओर अग्रसित हुआ। त्याग और बलिदान की इस भावना के कारण गैरीबाल्डी के चरित्र को भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम के दौरान खूब प्रचारित किया गया तथा लाजपत राय ने उसकी जीवनी लिखी।
काउंट कावूर की 1862 ई० में मृत्यु हो गयी।
1871ई० तक इटली का एकीकरण मेजिनी ,काउंट कावूर ,गैरीबाल्डी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं एवं विक्टर इमैनुएल जैसे शासक के योगदान के कारण पूर्ण हुआ।

*जर्मनी का एकीकरण :-

इटली के एकीकरण के दौरान ही जर्मन क्षेत्र में भी समान प्रक्रियाएँ चल रही थी। अतः दोनों देशों का एकीकरण लगभग साथ-साथ ही संपन्न हुआ।
आधुनिक युग आते-आते जर्मनी पूरी तरह से विखंडित राज्य था ,जिसमें लगभग 300 छोटे-बड़े राज्य थे। उनमे राजनितिक ,सामाजिक तथा धार्मिक विषमताएँ भी मौजूद थी।
               जर्मन एकीकरण की पृष्ठभूमि निर्माण का श्रेय नेपोलियन बोनापार्ट को दिया जाता है क्योकि उसने 1806ई० में जर्मन प्रदेशों को जीत कर राईन राज्य संघ का निर्माण किया था और यहीं से जर्मन राष्ट्रवाद की भावना धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
1834 में जर्मन व्यापारियों ने आर्थिक व्यापरिक समानता के लिए प्रशा के नेतृत्व में 'जालवेरिन'नामक संघ बनाया।

*बिस्मार्क :-

बिस्मार्क जर्मन डायट में प्रशा का प्रतिनिधि हुआ करता था ,प्रारंभ से ही हीगेल  विचारोँ से प्रभावित था और जर्मन संसद (डायट)में अपनी सफल कूटनीति का लगातार परिचय देता आ रहा था। वह निरकुंश राजतंत्र का समर्थन करते हुए जर्मनी के एकीकरण के प्रयास में जुट गया।
बिस्मार्क ने 'रक्त और लौह की निति '  अवलम्बन किया।

*यूनान में राष्ट्रीयता का उदय :-

यूनान का अपना गौरवमय अतीत रहा है ,जिसके कारण उसे पाश्चात्य का मुख्य स्रोत माना जाता था। यूनानी सभ्यता की साहित्यिक प्रगति ,विचार ,दर्शन ,कला ,चिकित्सा विज्ञान आदि क्षेत्र की उपलब्धियाँ युनानियों के लिए प्रेरणास्रोत थे।
फ्रांसीसी क्रांति से यूनानियों में राष्ट्रीयता की भावना की लहर जागी ,क्योकि धर्म ,जाती और संस्कृति के आधार पर इनकी पहचान एक थी।
         लेकिन तुर्की शासन से स्वयं को अलग करने के लिए आन्दोलन चलाये जाने लगे। इसके लिए हितेरिया फिलाइक नामक संस्था की स्थापना ओडेसा नामक स्थान पर की ,इसका उद्देश्य तुर्की शासन को यूनान से निष्काषित कर उसे स्वतंत्र बनाना था।
यूनान सरे यूरोप वासियों के लिए प्रेरणा एवं सम्मान का पर्याय था,जिसकी स्वतंत्रता के लिए समस्त यूरोप के नागरिक अपनी सरकार की तटस्थता के बावजूद भी उद्यत थे।          
           1832ई० में यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया।

*हंगरी :-                           

राष्ट्रवादी भावना के प्रसार का रूप हंगरी में भी नजर आता है। हंगरी पर ऑस्ट्रिया का प्रभुत्व था। 1848 की क्रांति के प्रभाव से यहाँ भी राष्ट्रीय आन्दोलन की शुरुआत हुई ,जहाँ आन्दोलन का नेतृत्व 'कोसुथ' तथा 'फ़्रांसिसी डिक' नामक क्रांतिकारी के द्वारा किया जा रहा था। कोसुथ लोकतांत्रिक विचारों का समर्थक था।
        फ्रांस में लुई फिलिप के पतन का हंगरी के राष्ट्रवादी आन्दोलन पर विशेष प्रभाव पड़ा। कोसुथ ने ऑस्ट्रियाई आधिपत्य का विरोध करना शुरू किया तथा व्यवस्था में बदलाव की मांग करने लगा और इसका प्रभाव हंगरी तथा ऑस्ट्रिया दोनों देशों की जनता पर पड़ा। 31 मार्च 1848 ई० को आस्ट्रिया की सरकार ने हंगरी की कई बातें मान ली,जिसके अनुसार स्वतंत्र मंत्रिपरिषद की मांग स्वीकार की गई।और इसमें केवल हंगरी के सदस्य ही सम्मिलित किये गए। प्रेस को स्वतंत्रता दी गई तथा राष्ट्रीय सेना की स्थापना की गई।
                           प्रतिनिधि सभा (डायट) की बैठक प्रतिवर्ष राजधानी बुडापेस्ट में बुलाने की बात स्वीकार की गयी,इस प्रकार इन आन्दोलनों ने हंगरी को राष्ट्रीय अस्मिता प्रदान की।  

*पोलैंड :-

पोलैंड में भी राष्ट्रवादी भावना के कारण रुसी शासन के विरुद्ध विद्रोह शुरू हो गए। 1830 ई० की क्रांति का प्रभाव यहाँ के उदारवादियों पर भी व्यापक रूप से पड़ा था परन्तु इन्हें इंग्लैंड तथा फ़्रांस की सहायता नहीं मिल सकी ,और इस समय रूस ने पोलैंड के विद्रोह को कुचल दिया।
*बोहेमिया :-
बोहेमिया ऑस्ट्रियाई शासन के अंतर्गत था ,बोहेमिया में भी हंगरी के घटनाक्रम का प्रभाव पड़ा। बोहेमिया की बहुसंख्यक चेक जाती की स्वायत्त शासन की मांग को स्वीकार किया गया ,परन्तु आन्दोलन ने हिंसात्मक रूप धारण कर लिया। जिसके कारण ऑस्ट्रिया द्वारा क्रांतिकारियों का सख्ती से दमन कर दिया गया।
        इस प्रकार बोहेमिया में होने वाले क्रांतिकारी आन्दोलन की उपलब्धियां स्थायी न रह सकी।