Ex :-7 व्यापार और भूमंडलीकरण
*विश्व बाजार :-उस तरह के
बाजारों को हम विश्व बाजार कहेंगे जहाँ विश्व के सभी देशों की वस्तुएँ आमलोगों को
खरीदने के लिए उपलब्ध हो।
जैसे :-भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई।
*विश्व बाजार के लाभ
⇒विश्व बाजार ने व्यापार और
उद्योग को तीव्र गति से बढ़ाया,व्यापार और उद्योग के विकास ने पूँजीपति,मजदूर और मजबूत मध्यमवर्ग
नामक तीन शक्तिशाली सामाजिक वर्ग को जन्म
दिया। कृषि उत्पादन के क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तन हुआ,कुछ नवीन फसलों का उत्पादन
इसी का परिणाम था।
जैसे:-रबर ,तम्बाकू ,कॉफी ,नील,इत्यादि।
विश्व बाजार ने नवीन तकनीकी को सृजित किया। इन तकनीकों में
रेलवे ,वाष्प इंजन ,भाप का जहाज ,महत्वपूर्ण रहा। इन तकनीकों ने विश्व बाजार उसके लाभ को कई गुण
बढ़ा दियाजैसे 1820 से 1914 के बीच विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना वृद्धि हो चुकी थी।
*विश्व बाजार के हानि
⇒ विश्व बाजार ने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद एवं
साम्राज्यवाद के एक नये युग को जन्म दिया साथ ही साथ भारत जैसे पुराने उपनिवेशों
का शोषण और तीव्र हुआ। उपनिवेशों की अपनी स्थानीय आत्म निर्भर अर्थव्यवस्था जिसका
आधार कृषि और लघु उद्योग तथा कुटीर उद्योग था ,जो यूरोपीय देशों ने व्यवस्थित नीति के तहत नष्ट किया। क्योकि
इसी पर उनकी औद्योगिक क्रांति सफल होती। औपनिवेशक लोगों के आजीविका को छीन लिया।
जैसे :-1800ई० में जहाँ भारतीय निर्यात में सूती कपडा का हिस्सा 30 प्रतिशत था वही 1815 में घटकर 15 प्रतिशत रह गया। 1870 तक आते आते यह केवल 3 प्रतिशत रह गया। इसके
विपरीत कच्चे कपास का भारत से निर्यात 1800 से 1872 के बीच 5 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गया।
➤ भारत में 1850 से 1920 के बीच कई बड़े
अकाल पड़े जिसमे लाखों लोग मर गये।
➤पूर्व मध्यकाल ,मध्यकाल ,आधुनिक काल में भी व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क विकसित हुआ।
अलेक्जेंड्रिया शहर,विश्व का पहला विश्व बाजार के रूप में उभर कर आया। जिसे सिकंदर
ने स्थापित किया था।
*वाणिज्यिक क्रांति
:-व्यापार के क्षेत्र में होने वाला विकास और विस्तार जो जल और स्थल दोनों मार्ग
से सम्पूर्ण विश्व तक पहुंचा,वाणिज्यिक क्रांति कहलाता है।
*औद्योगिक क्रांति :-वाष्प
शक्ति से संचालित मशीनों द्वारा बड़े-बड़े कारखानों में व्यापक पैमाने पर वस्तुओं का
उत्पादन।
*उपनिवेशवाद :-उपनिवेशवाद
ऐसी राजनैतिक आर्थिक प्रणाली है जो प्रत्यक्ष रूप से एशिया और अविकसित अफ्रीका तथा
दक्षिण अमेरिका में यूरोपीय देशों द्वारा त्याग किया गया। इसका एक मात्र उद्देश्य
था इन देशों का आर्थिक शोषण करना।
*गिरमिटिया मजदुर
:-औपनिवेशिक देशों से (भारत से) लोगों को निश्चित अवधि के लिए एक अनुबंध के तहत
यूरोपीय देश अपने यहाँ या फिर अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में ले जाते थे। इन
मजदूरों की मजदूरी बहुत कम होती थी तथा इन्हें मुख्यतः कृषि कार्य में लगाया जाता
था। इस तरह के मजदूरों को ही गिरमिटिया मजदुर कहा जाता है।
➤इस तरह के मजदूरों को भारत के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों पूर्वी
उत्तर प्रदेश ,पश्चिमी बिहार ,पंजाब ,हरियाणा से ले जाये जाते थे।
*साम्राज्यवाद :-यूरोपीय
देशों द्वारा एशिया और अफ्रीका के क्षेत्रों पर सैनिक शक्ति द्वारा विजय प्राप्त
कर उसे अपने अधीन में रखना,साम्राज्यवाद कहलाता है।
*आर्थिक संकट /आर्थिक मंदी
:-अर्थतंत्र में आनेवाली वैसी स्थिती जब कृषि,उद्योग और व्यापार का विकास अवरुद्ध हो जाए,लाखों लोग बेरोजगार हो जाए
तथा वस्तु और मुद्रा दोनों का दिवाला निकल जाए तथा वस्तु और मुद्रा दोनों की बाजार
में कोई कीमत नहीं रहे, तो इसे आर्थिक संकट कहते है।
*आर्थिक मंदी के कारण
⇒1929 के आर्थिक मंदी का बुनियादी कारण इस अर्थव्यवस्था के स्वरूप
में ही समाहित था। नवीन तकनीकी प्रगति तथा बढ़ते हुए मुनाफे के कारण उत्पादन में जो
भारी वृद्धि हुई उससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई की जो कुछ उत्पादित किया जाता था
उसे खरीद सकने वाले लोग बहुत कम थे। कृषि क्षेत्र में यह अति उत्पादन प्रथम
महायुद्ध के बाद भी बना रहा,लेकिन उसे खरीद सकने वाले लोग बहुत कम थे। इससे उन कृषि
उत्पादों की कीमते गिरी। गिरती कीमतों से किसानों की आय घटी,इस स्थिति से निकलने के
लिए उन्होंने उत्पादन को और बढ़ाया ताकि कम कीमत पर ज्यादा माल बेचकर अपना आय स्तर
बनाए रखा जा सके। इसने बाजारों में कृषि उत्पादों की आमद और बढ़ा दी तथा कीमते और
नीचे चली गई।
➤आधुनिक अर्थशास्त्री कडलीफ ने अपनी पुस्तक "दि कॉमर्स ऑफ
नेशन" में लिखा है की विश्व के सभी भागों में कृषि उत्पादन एवं खाद्दानो के
मूल्य की विकृति 1929-32 के आर्थिक संकटों का प्रमुख कारण था।
*आर्थिक मंदी का प्रभाव
⇒ मंदी का सबसे बुरा असर अमेरिका को ही झेलना पड़ा था। मंदी के
कारण बैंकों ने लोगो को कर्जे देना बंद कर दिया और दिए हुए कर्ज की वसूली तेज कर
दी ,किसान अपनी उपज नहीं बेच पाने के कारण बर्बाद हो गए। कर्ज की कमी से कारोबार
ठप पड़ गया इससे बैंको का कर्ज वापस नहीं चुक पाया। बैंकों ने लोगो के सामानों मकान
,कार आदि को
कुर्क कर लिया गया,लोग सड़क पर आ गए। कारोबार के ठप पड़ने से बेरोजगारी बढ़ी,कर्ज की वसूली नहीं होने
से बैंक बर्बाद हो गए एवं कई कम्पनियाँ बंद हो गई।
*शेयर बाजार :-वैसा स्थान
जहाँ व्यापारिक और औद्योगिक कंपनियों के बाजार मूल्य का निर्धारण होता है।
*सट्टेबाजी :-कंपनियों में
पूंजी लगा कर उसका हिस्सा खरीदना ताकि उसका मूल्य बढ़े और पुनः उसे बेच देना।
*संरक्षणवाद :-अपने वस्तुओं
को विदेशी वस्तुओं के आमद से होने वाले नुकसान से उसे बचाने के लिए विदेशी वस्तु
पर ऊँची आयात शुल्क लगाना।
➤महामंदी की शुरुआत अमेरिका से हुआ जो 1933 तक बना रहा। इस बीच
अमेरिकी राजनीति में फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट का उदय हुआ,उन्होंने 'नई व्यवस्था' (न्यू डील) नामक नवीन
आर्थिक नीतियों को अमेरिका में लागु किया।
*न्यू डील :-जनकल्याण की एक
बड़ी योजना से सम्बंधित नई नीति जिसमें आर्थिक क्षेत्र के अलावा राजनितिक और
प्रशासनिक नीतियों को भी नियमित किया गया।
➤1932 में लोजान सम्मलेन हुआ
जिसमें जर्मनी के क्षतिपूर्ति राशि को कम कर दिया गया ,ताकि व्यापार बढ़े।
*अधिनायकवाद :-वैसी
राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्था जिसमें एक व्यक्ति के हाथ सारी शक्तियाँ केंन्द्रित
होती है। वह व्यक्ति परिस्थितियों का लाभ उठाकर जनता के बीच नायक की छवि बनाता है।
➤द्वितीय महायुद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य
यह था की औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार बनाए रखा जाये। और
यह भी महसूस किया गया की इसी आधार पर विश्वशांति भी स्थापित की जा सकती थी।
➤आर्थिक विचार और उद्देश्य पर जुलाई 1944 में अमेरिका स्थित न्यू
हैम्पशायर "ब्रेटन वुडस" नामक स्थान पर सयुंक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं
वित्तीय सम्मेलन हुआ,जिसमे एक सहमति बनी जिसके बाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना की
गई।
➤युद्धोत्तर पुननिर्माण के लिए पैसे का इंतजाम करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय
पुननिर्माण एवं विकास बैंक(विश्व बैंक) का भी गठन किया गया। इन दोनों वित्तीय
संस्थाओं को जुड़वाँ संतान के नाम से जाना जाता है।
➤1944 में नीदरलैंड,बेल्जियम और लग्जवर्ग ने 'बेनेलेक्स' नामक संघ बनाया।
➤1948 में ब्रेसेल्स संधि हुआ,जिसमे यूरोपीय आर्थिक
सहयोग की प्रक्रिया कोयला एवं इस्पात के माध्यम से शुरू हुआ।
➤1957 में यूरोपीय आर्थिक
समुदाय,यूरोपीय इकनॉमिक कम्युनिटी एवं E.E.C की स्थापना की।
*भूमंडलीकरण :- भूमंडलीकरण
जीवन के सभी क्षेत्रो का एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप है। जिसने दुनिया के सभी भागों
को आपस में जोड़ दिया है जिससे संपूर्ण विश्व एक बड़े गावं के रूप में परिवर्तित हो
गया है। मूलरूप से भूमंडलीकरण राजनीतिकरण ,आर्थिक समाजिक,वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विश्वव्यापी समायोजन की एक
प्रक्रिया है जो विश्व के विभिन्न भागों के लोगो को भौतिक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर
एकीकृत करने का सफल प्रयास करती है।
भूमंडलीकरण नामक शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल सयुंक्त राज्य अमेरिका के जॉन विलियम्सन ने 1990 में किया।
➤आर्थिक हितों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए गठित
क्षेत्रीय संगठनों जैसे जी-8 ,ओपेक,आसियान,सार्क,जी-15,जी-77 इत्यादि का भी भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को विकसित करने में
महत्वपूर्ण भूमिका रही।
*बहुराष्ट्रीय कंपनी :-कई
देशों में एक ही साथ व्यापार और व्यवसाय करने वाले कंपनी को बहुराष्ट्रीय कंपनी
कहा जाता है। 1920 के बाद इस तरह की कम्पनियों का उत्कर्ष हुआ जो द्वितीय
विश्वयुद्ध के बाद कफी बढ़ा। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पूंजीवादी देशों की बड़ी-बड़ी
व्यापारिक एवं औद्योगिक कम्पनियाँ है।
जैसे :-फोर्ड कम्पनी ,सैमसंग,डाबर,हिन्दुस्थान लिवर इत्यादि