Ex :-6 जनन

जनन (Reproduction)

जनन वैसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रत्येक जीवधारी अपने समान जीवों की उत्पत्ति करता है ताकि उसका अस्तित्व इस पृथ्वी बना रहे।
*जनन तंत्र :-जनन की प्रक्रिया में भाग लेने वाले अंगो को सम्मलित रूप से जनन तंत्र कहते है।
*जनन के प्रकार
जीवों में जनन मुख्यतः दो प्रकार से होती है।
1.अलैंगिक जनन(Asexual Reproduction) :-जनन की वैसी प्रक्रिया जिसमे दो भिन्न लिंग अलग से भाग नहीं लेते है ,बल्कि दोनों के गुण एक ही में मौजुद रहता है तो उसे अलैंगिक जनन कहते है।
जैसे :-बैक्टीरिया ,केंचुआ ,जोंक
अलैंगिक जनन की विशेषता
(i)अलैंगिक जनन में सिर्फ एक व्यषिट भाग लेता है।
(ii)इस प्रकार के जनन में नर युग्मक के शुक्राणु तथा मादा युग्मक के अंडाणु अलग से भाग नहीं लेता है।
(iii)इस प्रकार के जनन में कम समय में अधिक संतान की प्राप्ति होती है।
(iv)इसमें समसूत्री विभाजन द्वारा जनन होता है।
(v)अलैंगिक जनन में उत्पन्न संतान के अनुवांशिक गुण अपने पुर्वज के समान होता है। 
(vi)इसमें निषेचन की क्रिया नहीं होती है।
(vii)इसमें जनन में कायिक कोशिका भाग लेता है।
*अलैंगिक जनन की विधियाँ
अलैंगिक जनन मुख्यतः चार विधियों द्वारा संपन्न होता है।
(i)विखंडन
(ii)मुकुलन
(iii)अपखंडन या पुर्नजनन
(iv)विजाणुजनन
विखंडन(Fission)
विखंडन द्वारा जनन एक कोशिकीय जीवों में होता है ये मुख्यतः दो विधियों द्वारा होता है।
(i)द्विखंडन या द्विविभाजन
(ii)बहुखंडन या बहुविभाजन
(i)द्विखंडन या द्विविभाजन :-वैसा विभाजन जिसके द्वारा एक व्यष्टि से खण्डित होकर दो का निर्माण होता है तो उसे द्विखंडन कहते है।
(ii)बहुखंडन या बहुविभाजन :-वैसा विभाजन जिसके द्वारा एक व्यष्टि खण्डित होकर अनेक व्यष्टियों की उत्पत्ति करता है तो उसे बहुखंडन कहते है।
*विखंडन विधि द्वारा जनन करने वाले जीव
अमीबा ,पैरामीशियम ,युग्लीना ,बैक्टीरिया आदि
मुकुलन(Budding)
मुकुलन एक प्रकार का अलैंगिक जनन है जो जनक के शरीर में अनेक धरातल से कलिका फूटने या पश्र्वद्ध निकलने के फलस्वरूप संपन्न होती है ,तो उसे मुकुलन द्वारा जनन कहते है।
*मुकुलन द्वारा जनन करने वाले जीव
:-हाइड्रा ,यीस्ट
हाइड्रा निम्न श्रेणी का बहुकोशकीय जीव है।
अपखण्डन या पुर्णजानन(Fragmentation or Regeneration)
जिस प्रकार के जनन में जीवों का शरीर किसी कारण से दो या दो से अधिक टुकड़ों में खंडित हो जाता है तो प्रत्येक भाग अलग विकसित होकर अपना अस्तित्व बनाकर जीवित रहता है तो उसे अपखण्डन कहते है।
*अपखण्डन द्वारा जनन करने वाले जीव
स्पाइसोमेरा ,प्लेनेरिया ,नेरीज
विजाणुजनन(Sporulation)
इस प्रकार का जनन निम्न श्रेणी के जीवो में होता है जिसमें सूक्ष्म थैली जैसी विजाणुधानियों का निर्माण होता है। जिसके भीतर गोल हल्की रचनाएँ होती है। जिसे विजाणु कहते है। समान वातावरण में इसकी दिवार टूटती है ,फलस्वरूप अधिक संख्या में जीवों का निर्माण होती है।
*विजाणु द्वारा जनन करने वाले जिव
बैक्टीरिया ,कवक ,शैवाल
कायिक प्रवर्धन(Somatic amplification)
जनन की वह प्रक्रिया जिसमे पादप शरीर का कोई वर्धि भाग जैसे जड़,तना ,पत्ति आदि को उसे विलग कर प्रतिरोपित करते है जिसके फलस्वरूप नए पौधे का निर्माण होता है ,तो उसे कायिक प्रवर्धन कहते है।
जैसे :-अंगुल,गुलाब ,केला

*उत्तक सवंर्धन(Tissue Culture)
यह एक कृत्रिम विधि है जिसमे पौधे के वर्धि भाग को पौधे के लिए अवश्यक पोषक तत्व एक बिकर में लेकर डालते है और उसके बाद उस टुकड़े को निकालकर प्रतियोपित करने से नए पौधे का निर्माण होता है तो उसे उत्तक संवर्धन कहते है।

*लैंगिक जनन(Sexual reproduction) :- जनन की वैसी प्रक्रिया जिसमे दो भिन्न लिंग ,अर्थात नर और मादा भाग लेते है ,लैंगिक जनन कहते है।
लैंगिक जनन की विशेषता
(i)नर तथा मादा जनकों द्वारा अलग अलग प्रकार के युग्मकों का निर्माण होता है।
(ii)नर युग्मक आकार में छोटा एवं सचल होता है।
(iii)मादा युग्मक आकार में बड़ा तथा अचल होता है।
Note :-नर युग्मक को शुक्राणु (Sperm) और मादा युग्मक को अंडाणु (Ovum) कहते है।
लैंगिक जनन में दो मुख्य क्रियाएँ होती है।
1. युग्मकों का निर्माण
2. युग्मकों का संगलन
*निषेचन(Fertilization) :-नर तथा मादा युग्मकों के संयोजन की क्रिया को निषेचन कहते है।निषेचन के फलस्वरूप सर्वप्रथम एककोशिकीय युग्मनज या जाइगोट का निर्माण होता है।
लिंग के आधार पर जीवों को दो वर्गों में बांटा गया है।
(i)एकलिंगी(Unisexual):-एकलिंगी वे होते है जिनमे नर और मादा लिंग अलग-अलग जीवों में पाए जाते है।
जैसे :-मनुष्य ,पपीता ,मेढ़क आदि
(ii)द्विलिंगी(Bisexual):-द्विलिंगी वे होते है जिनमे नर और मादा लिंग एक ही मौजूद होते है।
जैसे :-केंचुआ ,कृमि ,हाइड्रा आदि
Note :-जो जीव केवल शुक्राणु उत्पन्न करते है,उन्हें नर जीव कहते है एवं जो जीव सिर्फ अंडाणु उत्पन्न करते है उसे मादा जीव कहते है।

पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन

लैंगिक जनन के लिए पुष्पी पौधों में फूल ही वास्तविक जनन भाग है ,क्योंकि इनमे जनन अंग उपस्थित होते हैं जो जनन क्रिया के लिए आवश्यक है।

पुष्प एवं इसके जनन भाग
पुष्प एवं इसके जनन भाग सामान्यतः फूल एक डंठल के द्वारा तने से जुड़ा रहता है ,जिसे वृंत या पेडिसेल कहते है।
वृंत के सिरे पर स्थित फुला हुआ तथा चपटा भाग पुष्पासन या थैलमस कहलाता है।
एक फूल में चार प्रकार के पुष्पपत्र होते है।
1. बाह्यदलपुंज (Calyx)
2. दलपुंज (Corolla)
3. पुमंग (Androecium)
4. जायांग (Gynoecium)
*पुमंग (Androecium):-यह पुष्प का नर भाग होते है ,जिसमे कई लंबी -लंबी रचनाएँ होती है जिन्हे पुंकेसर(Stamens) कहते है।
पुष्प (फूल) का वास्तविक नर भाग पुंकेसर ही होता है।
पुंकेसर के दो मुख्य भाग होते है।
(i) तंतु (Filament):-यह लचीला ,पतला ,लंबा ,तथा डोरे के समान होता है और पुष्पासन से जुड़ा रहता है।
(ii)परागकोश(Anther):-यह तंतु के अग्रभाग में अवस्थित रहता है।
*जायांग (Gynoecium):-यह एक या एक से अधिक स्त्रीकेसर या कार्पेल्स का बना होता है।
जायांग पौधों का मादा भाग है।
स्त्रीकेसर में तीन भाग होते है।
(i)अंडाशय(Ovary):-यह स्त्रीकेसर का आधारीय भाग है जो पुष्पासन से जुड़ा रहता है,अंडाशय सामान्यतः फूली हुई रचन होती है।
(ii)वर्तिका :-अंडाशय से एक लंबी एवं पतली वृत्त जैसी रचना निकली रहती है ,जिसे वर्तिका कहते है।
(iii)वर्तिकाग्र :-वर्तिका के शिखर पर फूली हुई ,छोटी ,चिपचिपी रचना होती है ,जिसे वर्तिकाग्र कहते है।
अंडाशय के भीतर बीजांड रहते है ,और ये बीजांड अंडाशय की अंदरूनी भित्ति से जुड़े रहते है।
बीजांड के भीतर भ्रूणकोष (Embryo Sac) होता है जिसमे मादा युग्मक या अंडाणु होते है।
परागण(Pollination)
परागकणों के परागकोश से निकलकर उसी पुष्प या उस जाती के दूसरे पुष्पों के वर्तिकाग्र तक पहुंचने की क्रिया को परागण कहते है।
यह दो प्रकार का होता है।
(i)स्व-परागण(Self-Pollination):-जब एक ही पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हो या उसी पौधे के अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हो तो ,इसे स्व-परागण कहते है।
स्व-परागण केवल उभयलिंगी पौधों में ही होता है।
जैसे :-सूर्यमुखी ,बालसम आदि
(ii)पर-परागण(Cross-Pollination):-जब एक पुष्प के परागकण दूसरे पौधे पर स्थित पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचते है तो इसे पर-परागण कहते है।
मनुष्य में जनन(Reproduction in humans)
मनुष्य के जनन के प्रक्रिया में नर तथा मादा दोनों अलग से भाग लेते है।
मनुष्य एकलिंगी(Unisexual) प्राणी है,अर्थात नर जनन अंग तथा मादा जनन अंग अलग-अलग व्यक्तियों में पाए जाते है। इन्ही जनन अंगो के आधार पर मनुष्य पुरुष या नारी कहलाते है।
मानव जननांग लगभग 12 वर्ष की आयु में परिपक्व एवं क्रियाशील होने लगते है।
किशोरावस्था(Adolescence) में होने वाले परिवर्तन की अवस्था यौवनारंभ कहलाता है।
यौवनारंभ के समय शरीर में होने वाले परिवर्तन अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित हर्मोने के प्रभाव से होते है।
नर जनन तंत्र

जनन की प्रक्रिया में नर के निम्नलिखित अंग भाग लेते है।
(i)वृषण (Testes)
(ii)अधिवृषण (Epididymis)
(iii)शुक्रवाहिका (Vasa Differentia)
(iv)शुक्राशय (Seminal Vesicle)
(v)मूत्रमार्ग (Urethra)
(vi)प्रोस्टेट/काउपर ग्रंथि (Cowper’s Gland)
(vii)शिशन (Penis)
*वृषण(Testes) :-वृषण नर का प्रमुख जननाक है। यह एक जोड़ी पाया जाता है तथा दोनों जांघो के मध्य स्थित होता है। इसमें नर युग्मक शुक्राणु का निर्माण होता है। वृषण जिस थैली में स्थित होता है उसे वृषणकोश कहते है। ये हमारे शरीर से बाहर स्थित होते है क्योकि शुक्राणु का निर्माण हमारे शरीर के तापमान से दो से तीन (2-3•C)  कम तापमान पर होते है।
*अधिवृषण(Epididymis) :-यह एक 6m लम्बी कुंडलित नलिका होती है जो प्रत्येक वृषण के पीछे स्थित होती है ,ये वृषण से अच्छी तरह जोड़ी रहती है। इसका एक छोर वृषण से जुड़ा रहता है तथा दूसरा छोर अधिवृषण से आगे बढ़कर शुक्रवाहिका बनाता है। अधिवृषण शुक्राणु के प्रमुख संग्रह स्थान का कार्य करता है इसके अतिरिक्त अधिवृषण में शुक्राणुओं का परिपक्वन करता है।
*शुक्रवाहिका(Vasa Differentia) :-यह एक पतली नलिका है,जिसकी भित्तियां मांसपेशियों की बनी होती है। अधिवृषण से शुक्राणु शुक्रवाहिका में पहुँचते है। शुक्रवाहिका अधिवृषण को शुक्राशय से जोड़ती है। ये शुक्राणुओं को आगे की और बढ़ाने का काम करती हैं।
*शुक्राशय(Seminal Vesicle) :-यह एक जोड़ी पतली पेशी युक्त भित्तियों वाली रचना होता है। ये पौलियुक्त रचना वाला होता है यह प्रोस्टेट ग्रंथि के ऊपर स्थित रहता है दोनों और के शुक्राशय आपस में मिलकर स्खलन वाहिनी का निर्माण करती है इससे एक प्रकार का चिपचिपा द्रव्य स्रावित होता है।
*मूत्रमार्ग(Urethra) :-यह एक लम्बी मांसल नली है। इसमें दो सहायक ग्रंथि पुरस्थ तथा काउपर ग्रंथि खुलती है। मूत्रमार्ग से होकर मूत्र तथा वीर्य दोनों का त्याग होता है।
*प्रोटेस्ट:-यह मूत्रमार्ग से मूत्राशय तक सबंध रखता है। इसका आकार गोल सुपारी जैसे होता है दोनों पुरस्थ ग्रंथि सयुंक्त होकर एक समान पुरस्थ ग्रंथि का निर्माण करती है। इसमें लगभग दो दर्जन नलिकाएं होती है जो मूत्रमार्ग में खुलती है। इसमें एक प्रकार के पुरस्थ द्रव का स्राव होता है। इसी द्रव के कारण वीर्य में विशेष प्रकार की गंध पाई जाती है।
*काउपर ग्रंथि(Cowper’s Gland) :-पुरस्थ ग्रंथि के ठीक निचे एक जोड़ी छोटी काउपर की ग्रंथियां होती है इन ग्रंथियों की नलिका मूत्रमार्ग में खुलती है। यह ग्रंथि एक क्षारीय द्रव्य का स्राव करता है जो मादा योनि में प्रवेश कर उसकी अम्लीयता की ख़त्म कर शुक्राणुओं को संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करता है।
*शिशन(Penis) :-शिशन पुरषों का संभोग करने वाला अंग होता है। शिशन के माध्यम से शुक्रणु मादा के प्रजनन तंत्र में पहुँचाता है। मूत्र मार्ग मूत्राशय से प्रारंभ होकर शिशन से गुजर कर उसके ऊपरी भाग में खुलता है। शिशन शुक्र को शरीर से बाहर निकालकर मादा की योनि के भीतर तक पहुंचाता है।
मादा जननांग
 जनन की प्रक्रिया में मादा के निम्नलिखित जननांग भाग लेती है।
(i)अंडाशय (Ovary)
(ii)फेलोपियन नलिका / अण्डवाहिनिया (Fallopian Tube)
(iii)गर्भाशय (Uterus)
(iv)योनि /बल्बा /भग (vagina)
*अंडाशय(Ovary) :-यह मादा का प्रमुख जननाक है। यह एक जोड़ी पाया जाता है। तथा मादा युग्मक अंडाणु का निर्माण अंडाशय नमन ही होता है। ये उदार गुहा के निचले भाग में श्रेणी गुहा के दोनों ओर दाये और बायें एक - एक स्थिर होती है। इसके चारों ओर पेरिटोनियम नामक झिल्ली पाई जाती है।                                                           अंडाशय से दो हार्मोन एस्ट्रोजेन तथा प्रोजेस्ट्रॉन का स्त्राव होता है। जो ऋतु स्त्राव को नियंत्रित करता है
*फैलोपियन नलिका(Fallopian Tube) :- फैलोपियन नलिका की संख्या भी दो होती है। जो गर्भाशय के ऊपरी भाग के दोनों बगल में लगी रहती है। प्रत्येक फैलोपियन नलिका लगभग 10 cm लम्बी होती है। इस नलिका का एक शिरा गर्भाशय से सम्बन्ध रखता है जब कि दूसरा अंडाशय की ओर उँगलियों के सामान झालर बनता है। निषेचन की क्रिया इसी फैलोपियन नलिका में होता है।
*गर्भाशय(Uterus) :- यह नाशपति के समान एक रचना होती है। जो श्रोणिगुहा में स्थित होती है। यह सामान्यत: 7.5 cm लम्ब 5 cm चौड़ा तथा 3.5 cm मोटा होता है। इससे ऊपर की तरफ दोनों ओर कोने पर अंडवाहिनी खुलती है। इसका निचला भाग संक्रिण होता है। जिसे ग्रीवा कहते है। ग्रीवा आगे की ओर योनि में परिवर्तित हो जाता है। निषेचित अंडाणु गर्भशय में ही विक्सित होता है।
Note :- जो मादा शिशु का जन्म न दी हो उसके गर्भाशय का वजन 50 g होता है। और जो मादा शिशु का जन्म दे चुकी हो उसके गर्भाशय का वजन 100 g होता है
* योनि(vagina) :- यह एक नली के समान रचना होती है । यह लगभग 7.5 cm लम्बी होती है और यह बाहर के तल से गर्भाशय तह फैली रहती है। योनि के चारो तरफ हाइमेन या हाइसेन नामक झिल्ली पाई जाती है। जो प्रथम समभोग के दौरान टूटती है। जिसे मादा के योनि से रक्त का स्त्राव होता है। पुन: इस झिल्ली का निर्माण नहीं होता है।
*भग / वल्वा(Vulva) :-मादा के योनि द्वार के ऊपर मटर के दाने के समान गोल संरचना पाया जाता है जिसे भग या वल्वा कहते है। यह मादा का सबसे अधिक उत्तेजक अंग है।
*अंडोत्सर्ग :-अंडाणु के परिवर्धन के साथ-साथ गर्भाशय भी परिवर्धित होता है। परिवर्धन ये क्रियाएँ हार्मोन द्वारा नियंत्रित होती है। 28 दिन की सक्रियता में मानव अंडाशय सामान्यतः केवल एक अंडाणु की उत्पति करता है। अंडाशय द्वारा अंडाणु की निरमुक्ति को अंडोत्सर्ग कहते है।
*ऋतुस्राव चक्र या मासिक चक्र(Menstrual Cycle) :-ऋतु स्राव चक्र प्राइमेट जंतुओं में होता है। स्त्री का प्रजनन काल 12 -13 वर्ष की आयु में प्रारम्भ होता है ,जो 40 -50 वर्ष की उम्र तक चलता है। मादा में मासिक चक्र की पुनरावृति प्रत्येक महिने के 28 वे दिन में इसका पुनः चक्रण होता है।
गर्भधारण हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ
सम्भोग क्रिया द्वारा हमेशा गर्भ धारण नहीं होता है। इसके लिए कुछ परिस्थितियों का अनुकूल होना आवश्यक है।
 ये परिस्थितियाँ है :-
(i)गर्भधारण के लिए आवश्यक है की ऋतुस्राव के 14 वे दिन के आस-पास या 11 वे से 18 वे दिन के अंदर सम्भोग अनिवार्य रूप से हो।
(ii)अंडवाहिनी एवं गर्भाशय सूजन एवं संक्रमण से मुक्त हो।
(iii)वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या समान हो।
*मेनारिकी(रजोधर्म):-लड़कियों में मासिक चक्र का प्रथम बार प्रारंभ होना मेनारिकी कहलाता है। (12 -13 वर्ष )
*रजोनिवृति :-स्त्रियों में 40 -50 वर्ष की उम्र के पश्चात ऋतुस्राव नहीं होता है तो इसे ही रजोनिवृति कहते है।
*यौवनारंभ :-मनुष्य के जीवन काल में जब उसमे जनन क्षमता आरंभ होती है तब वह समय यौवनारंभ कहलाता है।
                    इस अवस्था में बालक अवम बालिकायों के शारीर में अनेक परिवर्तन देखने को मिलता है।
जैसे :-अवाजें भारी भरकम होना ,चेहरे पर दाने को आना ,बाह्य जननांगो पर कोमल कोमल बालों का उगना।
AIDS (एड्स)
इसका पूरा नाम एक्वायर्ड इम्यूलनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम।
इसे हिंदी में उपार्जित ,प्रतिरक्षा ,हिंताजन्य रोग कहा जाता है। यह वायरस द्वारा होता है तथा इस वायरस का नाम HIV होता है ,इसका पूरा नाम ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (Human immunodeficiency virus) है।
प्रभावित अंग :-एड्स के वायरस का पता सर्वप्रथम 1930 ई० में आफ्रिकी प्रदेश के रिसस नामक बन्दर प्रजाति में चला। लेकिन मनुष्य में इसके वायरस का पता सर्वप्रथम 1981 ई०  में अमेरिका के हटिया शहर में पता चला परन्तु भारत में इसके वायरस का पता सर्वप्रथम 1986 -87 में तमिलनाडु के चेन्नई शहर में पता लगा। यह एक लाइलाज बीमारी है, क्योकि इसके टिका या वैक्सीन का खोज नहीं हुआ।
लक्षण :-
(i)व्यक्ति का शारीरिक वजन दिन पर दिन घटते चले जाना।
(ii)स्मरण क्षमता कमजोर होना।
(iii)शरीर व चेहरे पर झुर्रियां पड़ना।
(iv)बुखार का ठीक न होना।
(v)घाव व जखमों का जल्दी ठीक न होना।
*फैलाव के कारण
(i)एक से अधिक व्यक्तियों के साथ असुरक्षित रूप से यौन संबंध बनाने से।
(ii)संक्रमित व्यक्तियों का रक्त दूसरे में प्रतिरोपित करने से।
(iii)एक ही सुइयों को एक से अधिक व्यक्तियों में लगाने से।
(iv)सैलूनों में एक ही ब्लेड से अधिक व्यक्तियों के दाढ़ी बनाने से।
(v)अगर माँ एड्स से पीड़ित है तो उसके गर्भ में पल रहे शिशु भी एड्स से पीड़ित हो सकता है।
Notes :-एड्स की जाँच के लिए एलिसा टेस्ट का विकास हुआ है।
 स्त्री नसबंदी को Tubec Tumy कहा जाता है।
पुरुष नसबंदी को Vasectomy कहा जाता है।
M.T.P :- Medical Termination of Pregnancy (गर्भ का चिकित्सीय समापन )